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भारी उद्योग विभाग की ऑटो निति
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ऑटो नीति
दृष्टिकोण
भारत में वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी आटोमोटिव उद्योग की स्थापना
और
2010 तक इस क्षेत्र के अर्थव्यवस्था में योगदान को दुगुना करना
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इस नीति का उददेश्य भारतीय आटोमोटिव
उद्योग की सम्पूर्ण, चरणबद्ध रूप से, टिकाऊ और स्व संपोषित वृद्धि करना है ।
उद्देश्य निम्नानुसार हैं :-
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क्षेत्र को औद्योगिक विकास तथा
रोजगार के उत्प्रेरक के यप में बढाना और देश में उच्च दर की मूल्य संवर्धन
प्राप्त करना ।
-
एक सार्वभौमिक प्रतिस्पर्धी
आटोमोटिव उद्योग को प्रोत्साहन देना और आटो-घटकों के लिए एक वैश्विक स्रोत के रूप
में उभरना ।
-
लघु, वहनीय यात्री कारों के उत्पादन
हेतु एक अतंर्राष्ट्रीय केन्द्र तथा विश्व में र्टेक्टर तथा दुपहिया वाहन उत्पादन
हेतु एक मुख्य केन्द्र स्थापित करना ।
-
भारतीय अर्थव्यवस्था तथा स्थानीय
उद्योग को न्यूनतम जोखिम पर व्यापार खोलने हेतु एक संतुलित परिवर्तन सुनिश्चि
करना ।
-
उद्योग के सतत् आधुनिकीकरण में
सहायता करना तथा स्वदेशी डिजायन, अनुसंधान तथा विकास को सुगम बनाना ।
-
आटोमोटिव तकनीक में भारतीय
सॉफ्टवेयर उद्योग का परिचालन करना ।
-
वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों द्वारा
नोदित वाहनों के विकास में मदद करना ।
-
घरेलू सुरक्षा तथा अंतर्रार्ष्टीय
मानदण्डों के अनुसार पर्यावरणीय मानकों का विकास करना ।
2.पृष्ठभूमि
2.1
आटोमोटिव
उद्योग अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण चालक के रूप में सार्वभौमिक तौर पर उभरा है
। यद्यपि भारत में आटोमोटिव उद्योग लगभग छ: दशक पुराना है, 1982 तक, केवल तीन
निर्माताओं :-मैसर्स हिन्दुस्तान मोटर्स, मैसर्स प्रिमियर आटोमोबाइल्स और मैसर्स
स्टैण्डर्ड मोटर्स, का मोटर कार क्षेत्र पर कब्जा था । कम मात्रा के कारण, इसने
अप्रचलित तकनीकों को जारी रखा और विश्व उद्योग के परिदृश्य से बाहर था । 1982 में,
समकालीन मोडल्स के मात्रात्मक उत्पादन की स्थापना के लिए, जापान की सुजुकी के सहयोग
से एक सरकारी पहल के रूप में मारूति उद्योग लिमिटेड (एलयूएल) आया । 1993 में
लाइसेंस हटने के पश्चात, 17 नये साहसी आये जिनमें से 16 कार उत्पादन हेतु थे । यह
उद्योग वर्तमान में सकल घरेलु उत्पाद का लगभग 4%
हिस्सा है ।
3.वर्तमान नीति
3.1.
1.4.2001 से
प्रभावी क्यू आर के हटाने से पूर्व, नीति में पुंजीगत वस्तुएं तथा आटोमोटिव घटकों
का आयात खुले सामान्य लाइसेंस के तहत था, किन्तु कारों तथा आटोमोटिव वाहनों का
पूर्ण निर्मित इकाई (सीबीयू) के रूप में या पूर्णत विखंडित (सीकेडी) या अंशत:
विखंडित (एसकेडी) के रूप में आयात सीमित था । कार निर्माता इकाईयों को, डायरेक्टर
जनरल फोरेन ट्रेड (डीजीएफटी) के साथ समझौता ज्ञापन निष्पादित करने पर ही सीकेडी या
एसकेडी रूप में पुर्जे आयात करने हेतु लाईसेंस जारी किये जाते थे । 11 कम्पनियों ने
डीजीएफटी के साथ समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित किये जिसके तहत वे निम्नानुसार सहमत थे
:-
-
कारों का वास्तविक उत्पादन स्थापित
करना, न कि केवल वाहनों के पुर्जे जोडना
-
न्यूनतम 50 मिलियन अमेरिकन डॉलर की
विदेशी इक्विटी लाया यदि एक संयुक्त उपक्रम में बहुतायत में विदेशी इक्चिटी
स्वामित्व है ।
-
पुर्जों को तीसरे वर्ष तक न्यूनतम
50%
तथा पांचवे वर्ष या आयातों की प्रथम खेप के निपटान की तिथि से पहले न्यूनतम 70%
तक पुर्जों का देशीकरण करना । इसके उपरांत समझौता ज्ञापन तथा आयात लाईसेंस देने
में कटौती होगी ।
-
कारों, आटो कलपुर्जों इत्यादि
(एफओबी)
के निर्यात से आयातों पर विदेशी विनिमय बहिर्गमन को तटस्थ करना । यह दायित्व
उत्पादन प्रारंभ होने के तीसरे वर्ष से शुरू होना था और समझौता ज्ञापन की सक्रिय
अवधि के दौरान पूरा किया जाना था ।
4.भारतीय आटोमोटिव
उद्योग की चालू स्थिति
4.1.
इस उद्योग में वाणिज्यिक वाहन, बहुउपयोगी वाहन, यात्री कार,
दुपहिया वाहन, तिपहिया वाहन, ट्रेक्टर और आटो कलपुर्जे सम्मिलित हैं । वर्तमान में
15 कार एवं बहु उपयोगी वाहन निर्माता, 9 व्यावसायिक वाहन निर्माता, 14
दुपहिया/तिपहिया वाहन निर्माता तथा 5 इंजिन निर्माताओं के अतिरिक्त 10 ट्रेक्टर
निर्माता हैं । 1999-2000 में आटोमोटिव क्षेत्र में 50,000 करोड रूपये के निवेश के
साथ 59,500 करोड रूपये का टर्नओवर है । यह प्रत्यक्ष रूप से 4,50,000 लोगों को तथा
अप्रत्यक्ष रूप से 100,00,000 को रोजगार देता है और अब वैश्विक दिग्गजों द्वारा
तीव्र प्रतिस्पर्द्धा में अपनाया गया है ।
4.2.भारत
प्रतिवर्ष लगभग 38,00,000 दुपहिया वाहनों,5,70,000 यात्री कारों,1,25,000 बहु
उपयोगी वाहनों, 1,70,000 व्यावसायिक वाहनों तथा 2,60,000 ट्रैक्टरों का उत्पादन
करता है भारत का दुपहिया वाहन उत्पादन में दूसरा तथा व्यावसायिक वाहनों के उत्पादन
में पांचवां स्थान है ।
4.3.भारतीय
आटोमोटिव कलपुर्जा उद्योग घरेलू आटोमोबाइल उद्योग द्वारा मांगे जाने वाले कलपुजो की
सम्पूर्ण श्रेणी का निर्माण करता है और वर्तमान में लगभग 250,000 व्यक्तियों को
रोजगार देता है । आटो कलपुर्जा निर्माता दो प्रकार के खरीदारों
–
वास्तविक उपकरण निर्माता (ओइएम) तथा प्रतिस्थापन बाजार, को आपूर्ति करते हैं । बहुत
से लघु पैमाने के आपूर्तिकर्ता प्रतिस्थापन बाजार की विशेषता हैं जो संगठित
खिलाडियों पर चुगी कर छूट तथा निम्न उपरिखर्च के रूप में बढत हासिल करते हैं । ओइएम
बाजार से मांग, दूसरी ओर, नये वाहनों की मांग पर निर्भर है ।
4.4.आटो
क्षेत्र ने (ट्रैक्टरों को छोडते हुए) 1992 और 1997 के मध्य 22%
की अत्यधिक संचयी वार्षिक वृद्धि प्राप्त की । ट्रैक्टरों ने 16%
की संचयी वार्षिक वृद्धि प्राप्त की । कलपुर्जा उत्पादन 28%
से बढा । पिछले दो वर्षों में आटोमोबाइल क्षेत्र में कमी रही । यद्यपि, कलपुर्जा
उद्योग ने मुख्यत: अपने निर्यात प्रदर्शन के कारण एक धीमी किन्तु सकारात्मक वृद्धि
दर बनाये रखी । वर्षों से समस्त उत्पादन में कलपुर्जा उद्योग ने 10%
- 12%
का निर्यात हिस्सा बनाये रखा है ।
4.5.सडकें
परिवहन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है जैसे वे, वर्तमान अनुमान के अनुसार, माल
परिवहन का लगभग 65%
तथा यात्री भार का लगभग 87%
भाग ले जाती हैं । यद्यपि, भारत में 3.3 मिलियन किलोमीटर का सडक नेटवर्क है, जो
विश्व में दूसरा सबसे बडा है, भारतीय राजमार्ग भीडभरे होते जा रहे हैं । यातायात
प्रबधन तथा सडक दृष्टिकोण पर भी ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है ।
5.एक सार्वभौमिक
आटोमोटिव नीति की आवश्यकता
5.1.वर्तमान
नीति ने भारत में बहुत समुद्रपारीय कम्पनियों को आकर्षित किया है किन्तु अधिक
निवेशक हितकारी और डब्ल्यूटीओ प्रतिस्पर्द्धि होने की आवश्यकता आने वाली समस्याओं
को दर्शाती है ।भारतीय कार बाजार संभावनाओं से भरा है किन्तु वर्तमान मांग
परिदृश्य, कुछ को छोडकर, वृहद उत्पादन में अवरोधक है और प्रतिस्पर्धा के बजाय विवाद
में मदद करता है । विश्व भर में, बडे निर्माता तकनीक उत्थान हेतु, उत्पाद श्रेणी
बढाने हेतु, नये बाजारों में पहुंच हेतु, कीमतें कम करने हेतु तथा (ingingraft
versatility)
हेतु प्रतिबद्ध हैं । वे सामान्य घोषणा पत्रों, मॉड्यूल सम्मिलनों तथा कलपुर्जा
आपूर्तिकर्ता तथा ई-कामर्स द्वारा प्रणाली एकीकरण का सहारा लेते है ।
5.2.आटोमोटिव
उद्योग वर्तमान के वैश्विक परिदृश्य में विशाल संरचनात्मक परिवर्तन के मध्य में है
। वाहन निर्माताओं के बजाय प्रणाली संग्रहणकर्ताओं को आपूर्ति किये जाने जाने वाले
व्यक्तिगत लघु कल्पुर्जों के साथ, एकीकृत कलपुर्जों की प्रणाली आपूर्ति तथा उप
प्रणालियां आजकल का चलन बनते जा रहे हैं । इस प्रक्रिया में, अधिकांश एसएसआई इकाईया
जो लघु व्यक्तिगत कलपुर्जे बनाती हैं, पंक्ति 2 तथा पंक्ति 3 आपूर्तिकर्ता बनने के
रास्ते पर हैं जबकि मुख्य एमएनसीज को शामिल करते हुए बडी कंपनियां पंक्ति 1
कंपनियों में परिवर्तित हो रही हैं, जो पंक्ति 2 तथा 3 से खरीदती हैं तथा आटो
निर्माताओं को बेचती हैं ।
5.3.भारतीय
आटो क्षेत्र को समानांतर रूप से तथा विश्व उद्योग के साथ संगतता में वृद्धि आवश्यक
है । भारत में एक वैश्विक आटोमोटिव शक्ति बनने की क्षमता है । यद्यपि, आटो निर्माण
को एक स्व- संपोषित स्तर तक ले जाने हेतु योजनाबद्ध प्रयासों की आवश्यकता है जहां
उनके पास मात्रा हो,वे आवश्यक तकनीक का उत्पादन कर सकेंऔर विकसित उभरती आवश्यकताओं
की पूर्ति कर सके ।
5.4.किसी
भी निर्माण्ा संगठन हेतु परिमाण महत्वपूर्ण है । यद्यपि आटोमोबाइल क्षेत्र, वाहन
निर्माता साथ ही साथ आटो कलपुर्जे निर्माता दोनों के लिए यह अधिक महत्वपूर्ण है ।
परिमाण की कमी न केवल प्रभावी निर्माण में अपितु अनुसंधान व विकास तथा नये मोडल्स
के परिचय में भी बाधा डालती है । निवेश तथा राजकोषिय नीतियों को मात्रात्मक उत्पादन
तथा लघु कारों तथा आटो कलपुर्जों हेतु नवाचारो के लिए स्वदेशी क्षमता के लिए
वातावरण बनाना चाहिए ।
5.5.आटो
कलपुर्जा निर्माता धीरे धीरे वैश्विक पहचान बना रहे है और वर्तमान गिरावट के बावजूद
निर्यातों का एक निश्चित स्तर बरकरार रखे हैं । 2005 तक 1 बिलियन अमेरिकन डालर तथा
2010 तक 2.7 बिलियन अमेरिकन डालर का निर्यात लक्ष्य हासिल करना संभव होना चाहिए ।
इसके लिए तीन दीर्घकालीन विपणन नीतियों की आवश्यकता होगी : ओइएम द्वारा उसकी
वैश्विक स्रोत आवश्यकताओं के लिये निर्यात, पंक्ति 1 निर्माताओं को उनकी
अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृखला के भाग के रूप में निर्यात और उपरांत बाजार को
प्रत्यक्ष निर्यात । मुख्य चुनौतियां कम मात्रा
–
निम्न पैमाना, विखण्डन, अपर्याप्त अनुसंधान और विकास/तकनीक समर्थन, निम्न उत्पादन
स्तर, अंतर्राष्ट्रीय विपणन और एक प्रभावी आपूर्ति श्रृखला की स्थापना हेतु सीमित
संसाधन हैं ।
6.नीति उदृश्यों
की प्राप्ति हेतु उपाय
6.1.निवेश,
व्यापार शुल्क,कर और चुंगी के संबंधन में पहल नीति उदृश्यों की प्राप्ति हेतु साधन
होंगे । ये सरकार के आर्थिक सुधारों का रास्ता हैं और डब्ल्यूटीओ से किये वादों के
साथ साहचर्य में हैं ।
6.2.वाहन
संख्या में वृद्धि के अनुपात में सडक अवसंरचना की समानांतर उन्नति तथा विकास को
सुनिश्चित करने के लिए बढा हुआ संसाधन आवंटन ।
6.3.यातायात,
सुरक्षा तथा पर्यावरणीय पहलुओं के अबाध संचालन हेतु एक उचित नियामक ढांचा ।
7.
7.1.आटोमोबाइल
तथा कलपुर्जा निर्माताओं के 100%
विदेशी इक्विटी निवेश की स्वचालित स्वीकृति की अनुमति है ।
8.
आयात शुल्क
8.1.आयात
शुल्क का विस्तार इस तरीके से निर्धारित किया जाएगा ताकि बिना अनुचित संरक्षा के
केवल पुरजे जोडने के बजाय निर्माण क्षमताओं के विकास को सुगम बनाना, मुक्त व्यापार
का संतुलित व्यवहार सुनिश्चित करना,बाजार में बढी प्रतिस्पर्धा को बढावा देना और
भारतीय ग्राहको के लिए खरीद विकल्पों को बढाना ।
8.2.सरकार
समय समय पर मांग प्रोत्साहन, उद्योग की वृद्धि को बढाने और भारत को अंतर्राष्ट्रीय
अस्वीकृतियों के लिए कूडा स्थल बनने से रोकने के लिए आटोमोटिव शुल्क संरचना का समय
समय पर पुनरीक्षण करेगी ।
8.3.सीमित
कीमतों वाले उत्पादों जैसे बस, ट्रक, ट्रैक्टर, सीबीयू और आटो कलपुर्जों के सम्बन्ध
में, सरकार स्वदेशी उद्योग द्वारा वैश्विक स्तर की प्राप्ति हेतु पर्याप्त ध्यान
देगी ।
8.4.आटो
नीति के साथ सामंजस्य में, असीमित उत्पादों जैसे मोटर कार, बहु उपयोगी वाहन,
मोटरसाइकिल, मोपेड, स्कूटर और आटो रिक्शा के संबंध में, आयात शुल्क इस तरह डिजायन
किया जाएगा कि घरेलु उद्योग को अनुचित संरक्षण को बढाए बिना देश में निर्माण को
अधिकतम प्रोत्साहन दिया जा सके ।
8.5.पूर्णत:
निर्मित इकाईयो (सीबीयू) के आयात के लिए शर्ते डायरेक्टर जनरल फोरेन ट्रेड
(डीजीएफटी) द्वारा पर्यावरण तथा सुरक्षा विनियमों को ध्यान में रखते हुए जारी
सार्वजनिक नोटिस के अनुसार होंगी ।
8.6.उपयोग
किये हुए वाहन जो देश में आयात किये जा चुके हैं, को सीएमवीआर, डीजीएफटी द्वारा
विशेष स्तरों और इस तरह के आयात हेतु अन्य शर्तों ध्यान रखते हुए जारी सार्वजनिक
नोटिस के अनुसार पर्यावरणीय आवश्यकताओं को पूरा करना होगा ।
8.7.
डम्पिंग तथा अनुचित व्यापार प्रयोगो को रोकने के लिए, एंटी
डम्पिंग शुल्कों को शामिल करते हुए उचित उपाय किये जाएंगे ।
9.उत्पाद शुल्क
9.1.मोटर कार
9.1.1.भारत
में कारों का स्वामित्व विकसित अर्थव्यवस्थाओं के 1000 जनसंख्या पर 500 के बजाय
मात्र 6 ही है । इसी प्रकार आटो क्षेत्र का जीडीपी तथा रोजगार में योगदान भी कम है
। स्थानीय मांग का विस्तार विशाल संभावनाएं रखता है और यह विशाल मात्रा में उत्पादन
की स्थापना के लिए परमावश्यक है ।
9.1.2.घरेलू
मांग मुख्यत: 3.80 मीटर से कम लम्बी छोटी कारों के इर्द गिर्द घूमती है। छोटी कारें
सडक पर कम स्थान घेरती हैं तथा ईधन बचाती हैं । ये 85%
से अधिक बाजार को कवर करती हैं । भारत निर्यात क्षमता विकसित कर सकता है तथा लघु
कारों के निर्यात का एशियाई केन्द्र बन सकता है ।
9.2.
9.2.1.कमजोर
सडक संसाधन तथा अच्छे राज्य परिवहन तंत्र की कमी के कारण, बहु उपयोगी वाहन ग्रामीण
भारत में मितव्ययी जन परिवहन का एक महत्वपूर्ण तरीका है । ये गांवों तथा अर्द्ध
शहरी बाजारों में किसानों, व्यापारियों, लघु व्यवसाईयों द्वारा खरीदे जाने वाले
प्रथम वाहन हैं । सरकार इस क्षेत्र को राजकोषीय सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास
करेगी ।
9.3.
9.3.1.वर्तमान
में एक निर्माता द्वारा बेचे जाने वाले व्यावसायिक वाहनों चाहे वे कैसिस हो या
सम्पूर्ण इकाई हों,पर उत्पाद शुल्क 16%
है । यद्यपि, एक निर्माता से खरीदी गई कैसिस पर एक स्वतंत्र बॉडी निर्माता द्वारा
निर्मित बॉडी पर कोई शुल्क आरोपित नहीं है । यह छूट कैसिस से पूर्ण ट्रक तथा बस
उत्पादन को प्रेरित करती है और सुरक्षा मानकों के प्रतिकूल है। वाहन के स्वतंत्र
ढाना बनाने वाले, लघु अथवा संगठित क्षेत्र द्वारा वाहन के ढांचे के विनिर्माण पर
शुल्क, शैसई विनिर्माताओं द्वारा बनाए गए ढांचों के शुल्क के बराबर होगा।
9.3.2.सरकार
वर्तमान में चल रहे टूक के शैसई के बदले यात्री के बेहतर आराम के लिए बनाया गया।
बस के शैसई पर बढ के ढांचे के निर्माण को बढावा देगी।
9.3.3.सरकार
माल ढुलाई के लिए मल्टी एक्सल वाहनों के प्रयोग को बढावा देगी क्योंकि ये वातन
वर्तमान में 2 एक्सल ट्रक की तुलना में कम पर्यावरण प्रदूषण और सडकों पर कम टूट-फूट
करते हैं।
10.
सडक अवसंरचना का सुधार
10.1.
सडकों पर ट्रैफिक प्रतिवर्ष 7 से 10%
के दर से बढ रही है जबकि विगत कुछ वर्षों से वाहनों की वृद्धि दर प्रतिवर्ष 12%
है। वाहन उद्योग के विकास में खराब सडक अवसंरचना तथा ट्रैफिक की भीड-भाड में
प्रतिस्पर्धा हो सकती है। वाहन के ट्रैफिक में वृद्धि में नियंत्रण के लिए
सार्वजनिक निवेश तथा नवीनतम प्रौद्योगिकीयां और प्रबंधन प्रक्रियाओं को शामिल करने
के अलावा निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करते हुए सडकों के समुचित
रखरखाव, उन्नयन और विकास के लिए एक संतुलित तथा उपयुक्त प्रयास किया जाएगा।
10.2.
जनता की यात्रा
की सुविधा के लिए, सरकार मल्टी मॉडल परिवहन और मास रेपिड परिवहन प्रणालियों के
कार्यान्वयन को भी बढाना देगी।
11.
अनुसंधान और विकास के लिए प्रोत्साहन
11.1.सरकार
उद्योग में उपयुक्त राजकोषीय और वित्तीय प्रोत्साहन मुहैया कराते हुए उोग के
प्रयासों के माध्यम से आटोमोटिव उद्योग में अनुसंधान तथा विकास को प्रोत्साहित
करेगी।
11.2.वर्तमान
नीति में प्रायोजित अनुसंधान और घरेलू अनुसंधान विकास व्यय के लिए आयकर अधिनियम,
1961 के तहत भारित कर कटौती शामिल है। यह 125%
के वर्तमान स्तरों से वाहन तथा कलपुर्जो के विनिर्माताओं के अनुसंधान तथा विकास
गतिविधियों को आगे भी सुधारेगी।
11.3.इसके
अतिरिक्त् कंपनी द्वारा इस उद्देश्य के लिए सक्षम तथा योग्य माने गए विशेष निकाय,
संकाय अथवा प्रीााग के तहत अथवा देश में किसी अन्य अनुसंधान और विकास संस्थान में
किए गए अनुसंधान और विकास पर वर्ष के दौरान कंपनी द्वारा सकल कारोबार के 1%
सीमाशुल्क पर लागू छूट के लिए वाहन विनिर्माताओं के लिए भी विचार विमर्श किया
जाएगा।
11.4.कर
में छूट, संयंत्र/उपकरण आयातों में रियायत शुल्क देते और आटोमेटिक अनुमोदन देते हुए
सरकार स्वतत्र आटो डिजाइन फर्म का गठन करने को बढावा देगी।
11.5.
आटोमोटिव उद्योग के अनुसंधान और विकास के लिए बनाए गए आटोमोटिव शुल्क निधि में
विनियोजन को बढाया जाएगा और इसके तहत कार्यविधियों के कार्यक्षेत्र में विस्तार
किया जाएगा।
12.
आवासीय, वाणिज्यिक और अन्य प्रयोग के लिए बाय-लॉ बनाना।
12.1.या
जाएगा।वाहनों में वृद्धि होने से , निर्विघ्न यातायात में बाधाएं आने लगी हैं।
सामान्यत: पार्किंग सुविधाओं के अपर्याप्त प्रावधान के कारण यह समस्या बढ गई है।
महानगर और प्रमुख शहरों में सरकार, राज्य सरकारों तथा स्थानीय निकायों के साथ सभी
वाणिज्यिक क्षेत्रों में पार्किंग व्यवस्था उन्नयन करने के अलावा वर्तमान आवासीय
क्षेत्रों के लिए सार्वजनिक पार्किंग का विनिर्माण, नये आवासीय भवनों के लिए
पार्किंग मानकों के सुधार के लिए बाय-लॉ में संशोधन करेगी । बहुमंजिला पार्किंग को
भी बढाना दि
13.पर्यावरण
संबंधित पहलू
13.1.
आटोमोटिव तथा
तेल उद्योग को पर्यावरण मानकों को पूरा करने के लिए सतत प्रयास करना होगा। सरकार कम
ईधन उत्सर्जन वाले आटो प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढावा देती रहेगी।
13.2.
डा.आर.ए.माशेलकर की अध्यक्षता में आटो ईधन नीति पर विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर
विचार करने के पश्चात सरकार ने वाहन उत्सर्जन मानकों और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए
अपेक्षित स्तरों के साथ आटो ईधन गुणवत्ता के लिए कार्यान्वयन हेतु एक रोड मैप
अनुमोदित किया है। सरकार अन्य संबंधित पहलुओं के साथ एक विस्तृत आटो ईधन नीति
बनाएगी और देश में न्यूनतम दरों पर उपयुक्त आटो ईधन/ईधन मिश्रण मुहैया कराना
सुनिश्चित करेगी। विभिन्न प्रौद्योगिकीय/मिश्र ईधन के प्रमाणीकरण, मोनीटरिंग और
उसे लागू करने हेतु उपयुक्त संस्थागत प्रणाली विकसित की जाएगी। आटो ईधन नीति के
कार्यान्वयन के लिए रोड मैप में विशेषता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त वित्तीय
उपायों को बनाया जाएगा।
13.3.कुछ
समय के लिए वाहन के उत्सर्जन मानकों को पूरा करने के लिए आवश्यक अन्य आटो ईधन के
साथ शॉर्ट चेन हाइड्रोकार्बन के प्रयोग को सरकार बढावा देगी।
13.4.उपयुक्त
आटोमोटिव प्रौद्योगिककी को बढावा देते हुए हाइड्रोकार्बन के अलावा, अन्य ऊर्जा
स्रोतो द्वारा चलने वाले वाहनों का शुभारंभ तथा विकास को सहायता देने की आवश्यकता
है। हाइब्रिड वाहन और बैटरी तथा ईधन सेल से चलने वाले वाहन परम्परागत आटोमोबाइल के
विकल्प जो कि पहले अव्यवस्थित थे। ऐसे वाहनों के विकास के लिए प्रोत्साहन के रूप
में, परम्परागत ईधनों पर आधारित वाहनों के साथ-साथ उनको अपनाने की सुविधा के लिए एक
दीर्घकालिलक उपयुक्त वित्तीय संरचना भी की जाएगी।
13.5.अंतर्राष्ट्रीय
तौर पर पुराने वाहनों के प्रयोग को बंद करने के लिए, उन वाहनों पर अत्यधिक रोड
टैक्स लिया जाता है। भारत में विभिन्न राज्यों में वाहनों पर रोड टैक्स की प्रकृति
और प्रमात्रा में अंतर है। जीवन-काल के लिए रोड टैक्स भी प्रचलन में है। यह प्रयास
अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक किया जाएगा।
13.6.पर्यावरण
के स्वरूप में तीव्र उन्नयन करने के लिए सरकार, ऐसे वाहनों के प्रतिस्थापन के लिए
प्रोत्साहनों के साथ वाणिज्यिक वाहनों के लिए एक आवधिक जीवन नीति बनाने पर विचार
करेगी।
14.सुरक्षा
14.1.सरकार
केन्द्रीय मोटर वाहन नियम, ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैण्डर्ड (भारतीय मानक ब्यूरो
)(बीआईएस) और अन्य सुसंगत प्रावधानों में संशोधन करेगी और सुरक्षा व्यवस्थापन जो कि
अंतर्राष्ट्रीय मानको के स्तर की , को प्रारंभ करेगी।
14.2.परीक्षण
और प्रमाणीकरण सुविधाओं में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सुरक्षा मानको तक संशोधन तथा
उनको सुदृढीकरण करने की आवश्यकता है। सरकार, उद्योग के साथ भागीदारी में इसको पूरा
करेगी।
15.मानको का समरूप
करना
सरकार अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था
में मानको के समरूप करने की आवश्यकता को जानती है और इसके लिए कार्य करेगी।